खुद ही खुद के पास गए,
खुद मिट गए/यूँ खाक हुए,
फिर खुद को तलाशा तो,
आप भी वहीं पर्दाफाश हुए...।
खुदी वही पे मुस्करा रही थी!
Wednesday, December 26, 2007
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"क्षितिज के उस पार खड़ी है / मेरी महबूबा/ मालूम तो है / पर रफ़्त इतनी सी है बस / कि दो कदम मैं उसकी ओर बढाता हूँ / और क्षितिज दो कदम पीछे खिसक जाता है।" इसी अंतहीन व्यथा की परिणति कुछ यूँ बयाँ होती है - "एक तमन्ना के लिए सारी तमन्नाये खाक कर दी मैने, जिन्दगी राख हो गयी ,जो तेरी तमन्ना कर ली | "
3 comments:
Gostei muito desse post e seu blog é muito interessante, vou passar por aqui sempre =) Depois dá uma passada lá no meu site, que é sobre o CresceNet, espero que goste. O endereço dele é http://www.provedorcrescenet.com . Um abraço.
खुदी वही पे मुस्करा रही थी!
Bahut khoob,shrawan ji.
"एक तमन्ना के लिए सारी तमन्नाये खाक कर दी मैने, जिन्दगी राख हो गयी ,जो तेरी तमन्ना कर ली | "
sir ji ye to bahut hi aachchha sher , is me aage to likheye
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