Tuesday, January 28, 2020

जय श्री राम

अपनी याददाश्त में मैंने कभी बाबूजी को मंदिर जाते नहीं देखा। Collective/social mode of worship का तो छोड़ दें, घर पर भी कभी पूजा पाठ करते नहीं देखा। बताने की आवश्यकता नहीं कि व्रत- अनुष्ठान आदि से भी उनका कोई विशेष मोह नहीं था। कभी सनातन संस्कार के नाम पर भी उन्होंने हम पांच भाई-बहनों में किसी में भी यह आदत डालने की जरूरत नहीं समझी और इसीलिए शायद कभी कोशिश भी नहीं की। माँ ने तो उनके लिए एक विशेषण भी इजाद कर लिया था - "अधरमी"। और उनको सही में नहीं पता था कि बाबूजी के नाम वाले कॉलम में सबसे पहले जो "डॉक्टर" लिखा जाता है, उसकी तहें "भारतीय दर्शन के कर्मकांड और संत-परंपरा के संगम" के शोध पत्र पर जाकर खुलती है। 

मां रोज पूजा करती थी, अभी भी करती है। घुटनों से लाचार हो रही है, लेकिन अभी भी रोज पूजा घर जाने की हिम्मत जुटा लेती है। पति और बच्चों के लिए precribed सारे व्रत उपवास उन्होंने किए। छठ का भी निर्वाहन अपने शारीरिक सामर्थ्य के हिसाब से कुछेक साल पहले तक करती रही। बाबूजी के "अधर्म" को काटने के लिए उन्होंने पूरे जी-जान से सारे कर्मकांड का धर्म निभाया।

फिर आया अपने-अपने जीवन को जी रहे 90 की आयु पार इन दोनों के सामने 9 नवंबर 2019 का दिन। सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया कि अयोध्या में जन्म स्थान पर राम जी का मंदिर बने। बाबूजी तो अब अखबार पढ़ते नहीं, समाचार देखते नहीं, बहुत होश भी नहीं रहता, सो भैया ने जा कर यह खबर सुनाया। सुनते ही आह्लादित हो गए और एक अजीब सी उर्जा का संचार हो गया। अपने अंदर विश्वरूप का भान लिए भैया को ठसक से बोले - "हम जिंदा छियौ, इहेले ऐसन decision अइलौ। अब राम-मंदिर बन जयतौ। फिर हमरा अयोध्या जी ले चलिहे।"
 मां ने तुरंत पत्नी धर्म निभाया- "आय तक कहियो मंदिर गैलहो, जे अब जैभो?" 

सदा की तरह बाबूजी चुप हो गए, लेकिन संपूर्ण जीवंतता और जिजीविषा से परिपूर्ण आंखें बोल रही थी - 
"मोदी जी, तुम मंदिर बनाओ। हम जरूर दर्शन करने जाएंगे।"


मेरे मन के राम

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में प्रभु श्रीराम के लिए भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में चार विभिन्न आसनों की साप्रसंगिक परिकल्पना की। मर्यादा पुरुषोत्तम तो लीला धरने ही आए थे, सो उनकी लीलाओं के अनुरूप कविराज ने अलग-अलग आसन की व्यवस्था की। सर्वप्रथम महाराजा जनक ने अपनी सभा में उन्हें वरासन (दूल्हे के लिए सजाया हुआ आसन ) पर बिठाया; फिर पत्नी जानकी ने चित्रकूट में कुश का आसन बनाया। लंका में भाई लक्ष्मण ने मृगछाला बिछाई और अंत में अयोध्या का सिंहासन तो चौदह वर्षों से प्रभु की प्रतीक्षा कर ही रहा था।

जनकपुर के आसन ने राम को एक प्रखर धनुर्धर छात्र की भूमिका से ऊपर उठा सामाजिक दायित्व के ऊंचे पायदान पर पहुंचाया। पति की भूमिका निभाना और गृहस्थ जीवन का सही पालन करना अपने आप में एक बड़ा ही कठिन दायित्व है। विवाह ही वह बिंदु है, जो पुरुष के जीवन में अपने माता-पिता के अलावा एक और माता-पिता का प्रवेश करवाता है। और सनातन धर्म हर राम से अपेक्षा करती है कि वह दशरथ और जनक दोनों का उचित सम्मान करें और उनके दिशा निर्देशन में आगे गृहस्थ जीवन का सही निर्वाह करे।

संकट के क्षणों में धर्म और आध्यात्म का ज्ञान एक व्यक्ति को टूटने से बचाता है और इन परिस्थितियों में पुरुष का अवलंबन होती है उसकी पत्नी। बनवास का दंश झेल रहे राम के लिए ऋषि मुनियों द्वारा  अध्यात्मिक विमर्श की आवश्यकता थी, ताकि उनकी बुद्धि कुशाग्र के समान और मन धरती के समान शांत रहे। चित्रकूट में उनकी सहचरी सीता ने इसी प्रयोजन से कुश के आसन की व्यवस्था की।

अगर युद्ध में विजय प्राप्त करनी है, तो युद्ध का प्रयोजन हर वक्त आंखों के सामने दिखती रहनी चाहिए; वह आग सीने में धधकती रहनी चाहिए। और इन कठिन परिस्थितियों में आपका सर्वश्रेष्ठ सहायक होता है-आपका भाई, आपका अपना परिवार। लंका में रणनीति बनाते समय लक्ष्मण ने सजाया- मृग-छाल का आसन, जो राम को उस स्वर्ण मृग की याद दिलाते रहे, जिसके कारण सीता का वियोग उन्हें झेलना पड़ा।

एक सफल गृहस्थ, ज्ञान-विज्ञान से सुशोभित और युद्ध में विजयी ही सुयोग्य व्यक्ति है अयोध्या का सिंहासन के लिए। उसकी नैतिकता और प्रबल आत्मविश्वास ही अपनी प्रजा जनों के लिए ऐसी निर्भयता की उद्घोषणा कर पाती है - 
"सनहु सकल पुरजन मम बानी। 
कहउँ न कछु ममता उर आनी।।
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। 
सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।।
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। 
मम अनुसासन मानै जोई।।
जौं अनीति कछु भाषौं भाई।
 तौं मोहि बरजहु भय बिसराई।।"

रामचरितमानस में इन चारों वर्णित आसनों से बढ़कर है "संतुष्टि का आसन"। जब आप अपने जीवन युद्ध में प्रबल विजयी रहे हों, अपने सारे दायित्वों का भली-भांति पालन कर लिया हो, पाने के लिए आपके अंदर कोई आकांक्षा ना बची हो, आपकी प्रबल मेहनत और कर्मों का फल दुनिया देख रही हो, तब अधिकारी होते हैं आप ऐसे आसन के लिए। उस पर बैठकर आप इस कौतूहल से भरे जगत को द्रष्टा बनकर देखते हैं और निस्पृह भाव से अपने अध्यात्म और जीवन ज्ञान को बिखेरते रहते हैं। आप सत्य को जी रहे होते हैं, आपका चित्त जागृत होता है और आनंद क्षण क्षण में विद्यमान रहता है - आप "सच्चिदानंद" होते हैं।


Sunday, January 26, 2020

टिक टिक घड़ी- 6

भैया मॉर्निंग वॉक करके वापस भी आ गए और इधर बाबूजी की किस्सागोई पूरे उफ़ान पर थी। ढ़ेर सारे अनसुने गाँव, अंजाने शहर और अपरिचित लोगों के नाम और उन सब से जुड़े नए-नए वाकये जब कानों में इकट्ठे हो गए, तो उनके अंदर का डॉक्टर जाग गया। अखबार लेकर बाबूजी के कमरे में घुसे और उनकी कमजोर नस दबा दी - " लगय छय, अब अयोध्या में राम मंदिर बन जैतय।"
राम जी का बाण बिल्कुल निशाने पर लगा! अपने आसपास बैठे सारे मुसाफिरों को अपनी- अपनी यात्रा पर उन्होंने रवाना किया और भैया के हाथ से सारे अखबार ले लिया। पन्द्रह मिनट के अंदर उन्होंने हिंदी के तीन अखबारों और अंग्रेजी के दो अखबारों का पन्ना-पन्ना अलग कर दिया।( भैया उनके पास पिछले दिनों के भी अखबार साथ में लेते चले जाते हैं।) देश-दुनिया- समाज के इस विहंगम अवलोकन के बाद बाबूजी ने अपना conclusice remark दे डाला - "नय बनयलकै अब तक, लगय छय।" भैया ने भी सुर लगा दिया - "बनतय त, सब्भे कोय चलबै साथे।"
बाबूजी खुश हो गए। भाभी तब तक दूध-रोटी ले आई थी। खाते-खाते वाल्मीकि रामायण से रामचरितमानस तक इधर-उधर कर डाला। कम्बन तक बात पहुंचती, उससे पहले खाना खत्म हो गया था। भैया ने बिस्तर पर उन्हें लिटा कर सर के नीचे तकिया लगा दिया। उनींदी आँखें पत्थर सी बोझल हो रही थी; शरीर थका थका सा लग रहा था। नींद का नशा हवाओं में घुलता जा रहा था। कमरे में किसी और ही लोक की दिनचर्या चल रही थी; कोई और "घड़ी" अपना काम बराबर कर रही थी।
कुछ देर बाद भैया विजयी भाव से कमरे से निकले- नींद की दवाई दिए बिना बाबूजी सो गए थे!

टिक टिक घड़ी - 5

उस दिन बंद कमरे में जिला स्कूल के प्रिंसिपल साहब और महना गाँव के मिडिल स्कूल के मास्टर के मध्य करीब आधे घंटे तक क्या गुफ़्तगू हुई, वह बाहर किसी को पता नहीं चला। बालक सच्चिदानंद ऑफिस से थोड़ी दूर गलियारे में खड़े होकर इस बात का इंतजार कर रहे थे कि कब दोनों एक साथ आएंगे और उनकी पुरकस्स दनादन पिटाई शुरू हो जाएगी। पिता के लातों के करारे प्रहारों का स्मरण वहां से भी भाग जाने को प्रवृत कर रहा था। लेकिन सरकारी स्कूल का चपरासी पूरा घुटा हुआ था। बिना पैसे के होनेवाले मनोरंजन की आशा में उन पर भरपूर नजर जमाए हुए था।
लेकिन दो दिनों के इस नाटकीय घटनाक्रम की परिणति सुखांत में ही हुई। दोनों शिक्षाविद हंसते हुए निकले और पिता ने इशारे से बालक को पास बुलाया। प्रिंसिपल साहब के चरण स्पर्श करने की कवायद देकर बोला कि आज से यही तुम्हारे पिता हैं और आगे की पढ़ाई तुम्हारी इसी स्कूल में होगी। और ऐसे रोमांचक तरीके से हाई स्कूल, बीहट से जिला स्कूल, बेगूसराय का सफर तय हुआ।
बी पी हाई स्कूल में बिताए गए दो सालों ने बहुत कुछ सिखाया। "सरस्वती भी सरस्वती का पोषण कर सकती है" - यह ज्ञान आगे आने वाले सालों के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुआ। शायद ट्यूशन पढ़ा कर अपनी पढ़ाई करने वाले हर इंसान के जीवन में कुछ ऐसा ही गुजरता होगा! प्रिंसिपल साहब का बेटा भी कक्षा में अच्छा करने लगा और छात्र सच्चिदानंद सिंह दसवीं में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया। इसी तरह गाड़ी आगे बढ़ने लगी, जिसकी परिणति M.A.( triple) , PhD के रूप में हुई।
अपने संघर्ष के दिनों के बारे में बाबूजी बहुत कुछ नहीं बोलते। हाँ, कमजोर क्षणों में थोड़ा दरिया बह निकलता है। मुंगेर में किसी वकील साहब के यहां रहकर जब अपनी पढ़ाई करते थे, तब का एक किस्सा है। अपनी सबसे प्यारी हमउम्र सगी बहन के बीमारी से गुजर जाने की खबर मौत के बीस-पच्चीस दिन बाद जिस दिन मिली, उनका मन बड़ा ही उद्विग्न था। वकील साहब के बेटे को पढ़ाने से मना कर दिया कि आज तबीयत खराब है। कुछ समय के बाद बच्चे की मां उनके कमरे के दरवाजे पर थी - "तबीयत खराब है, तो खाना भी तो आज नहीं खाइएगा।" अगले ही सबेरे उन्होंने वहां से अपना सामान बाँध लिया था।

टिक टिक घड़ी - 4

आग की तरह पूरे गाँव में यह बात फैल गई कि मास्साब का बेटा 'सस्ता' ( बिहार के अद्वितीय एवं खालिस उज्जड़पन में 'सच्चिदानंद' का पुकारू संस्करण) घर छोड़कर भाग गया है। शाम होते-होते घर के आगे भीड़ लग गई। सन् 1946-47 का समय था, सो लोगों की creativity परवान पर थी। किसी ने गांधी जी का चेला बनवा दिया, तो किसी ने आजाद हिंद फौज join करवा दी। एकाध मजमा लूटने वालों ने माहौल बनाने के लिए प्रत्यक्षदर्शी बन उन्हें सिमरिया घाट ( गंगा नदी) की ओर जाते हुए बता दिया! घर के अंदर औरतें रोने पर बदस्तूर लगी हुई थी।
माहौल पूरा गमगीन और सनसनीखेज बन चुका था, लेकिन इन सब से निस्पृह थे - ' कुल दो इंसान '। दादा जी को अपने बेटे के बारे में भलीभांति मालूम था; उनकी फितरत से वह वाकिफ थे। "पढ़ाई में अच्छा है, और पढ़ाई करना चाहता है " - बेटे के मन की इस इच्छा को तो वो जानते ही थे। साथ ही कितना डरपोक है, यह भी उन्हें बखूबी मालूम था। तो लड़ने-झगड़ने या सेना join करने वाले options को उन्होंने बहुत पहले ही मन मे rule-out कर दिया। अपने दिए हुए संस्कारों और अपने होनहार बेटे पर पूरा भरोसा था, इसीलिए गंगा में डूब मरने की theory भी अस्वीकार कर दी।
दूसरा इन सब से अनजान गांव से 15-16 किलोमीटर दूर बेगूसराय के बीपी हाई स्कूल की बिल्डिंग के अंदर था। शाम में छुट्टियों के बाद सभी चले गए, लेकिन एक लड़का अभी भी उसी प्रांगण में था। लड़के का सौभाग्य मानिए या विधि का विधान, सारा काम निपटा कर अपने आवास की ओर जाते हुए प्रिंसिपल साहब की नजर इस लड़के पर पड़ गई। थकान, भूख और डर - तीनों के कारण लड़के का चेहरा कुम्हलाया हुआ था। दो-चार सवाल पूछे तो, प्रिंसिपल साहब को सारा माजरा समझते देर न लगी। पहले तो भरपेट भोजन करवाया, फिर आधे घंटे का शैक्षणिक इंटरव्यू लिया। एक कुशल प्रशासक की तरह मामला हैंडल करते हुए लड़के को तत्काल तो अपने पांचवें में पढ़ रहे बेटे को पढ़ाने पर लगा दिया और रात में खाना खाने के बाद सरसों तेल से अपने शरीर की मालिश करने का फरमान जारी कर दिया। सुबह पौ फटते ही चपरासी प्रिंसिपल साहब के आदेशानुसार महना गाँव के मास्टर फौजदार सिंह के घर की ओर रवाना हो गया।
" मुसाफिर लोग, ठंढ बढ़ रहा है। एक कप चाय और पीजिएगा ? "
उनके जवाब की बिना प्रतीक्षा किए हुए कमरे के दरवाजे की ओर मुँह कर बाबूजी जोर से बोले- "एक बार और चाय ले आओ।"

ब्रह्म मुहूर्त शुरू हो चुका है। घड़ी की छोटी वाली सुई चार के अंक को पार कर चुकी है, लेकिन बाबूजी की मजलिस परवान पर है। कौन कहेगा कि इतना कम बोलने वाले के पास किस्सों का इतना भंडार है!

टिक टिक घड़ी - 3

"ऐ मुसाफिर, कहां जा रहे हैं? थक गए होंगे, दस मिनट आराम कर लीजिए। चाय-पानी पीते जाइए।"
रात के करीब दो-ढाई बज रहे हैं और बाबू जी अपने तफरीह के पलों के लिए दोस्त जुगाड़ रहे हैं। अधिकतर तो चाय-पानी के प्रलोभन में ही ठहर जाते हैं, पर कुछ ढीठ टाइप के मुसाफिरों को अलग तरीके से घेरना पड़ता है।
"लंच का टाइम हो गया है, सब अपना-अपना कलेवा खोलकर साथ में खा लीजिए।" - फिर संस्कृत का एक श्लोक, जिसका मतलब कुछ ऐसा है कि साथ-साथ खाने मैं ही जीवन की सार्थकता है और सनातन धर्म का मूल भी इसी में टिका है!
ब्लोअर को बिल्कुल बेड के पास खिसकाते हुए सर्दी की रातों का अमोघ अस्त्र भी चला देते हैं - " बिल्कुल कंपकपाती ठंढ है। यहां तो अलाव भी जल रहा है। तनिक बैठ तो जाइए, देह गरम हो जाएगा।"

लगता है, कुनबे में पांच-सात जने जुड़ गए हैं, क्योंकि हुलसते स्वर में दरवाजे की तरफ मुंह कर ऊंची आवाज में सात-आठ चाय लाने का फरमान भेज दिया। फिर दुनिया-जहान की बातें शुरू होती है। कभी गाँव के बचपन के किस्से, तो कभी कितनी तकलीफों से अपनी पढ़ाई-लिखाई पूरी की, उसके किस्से। बकौल बाबूजी उनके जीवन की दो ही उपलब्धियाँ रही हैं - उनकी पढ़ाई और उनके बच्चे।
उनके पिताजी (मेरे दादाजी) खुद तो शिक्षक थे, शिक्षा का मोल भी समझते थे। पर बड़े परिवार को चलाने के खर्चे और ब्रिटिश इंडिया में मिल रहे मासिक तनख्वाह की रकम ने इन मूल्यों को थोड़ा व्यवहारिक बना दिया था। सो आठवीं क्लास के बाद उन्होंने अपने हाथ खींच लिए थे और स्वतंत्र कर दिया था कि आगे पढ़ाई करना है तो खुद व्यवस्था कर लो। और मजे की बात तो सुनो- जिम्मेदारी का बोझ महसूस करवाने के लिए आठवीं क्लास में शादी भी करवा दी थी!
बाबा (दादाजी) की अपनी रणनीति थी। इंडस्ट्रियल एरिया में बसे मेरे गाँव के लड़कों को उस समय नौकरी पाने में कोई विशेष तकलीफ नहीं थी। जिनकी भी जमीन का अधिग्रहण होता था, उस घर के सभी लड़कों को "नौकरी" मिल जाती थी। सो पिता जहाँ चतुर्थ वर्ग के एक नौकरी का जुगाड़ कर रहा था, बेटे के मन में आगे पढ़ने की धुन सवार थी। पिता-पुत्र के वैचारिक द्वन्द की एक ही परिणति होनी थी - बेटा घर छोड़कर बेगूसराय भाग गया!

टिक टिक घड़ी - 2

सो बाबूजी की शरीर की घड़ी बड़ी ही धीमी हो गई है। उनके दिन-रात थोड़े लंबे हो गए हैं। जितने समय में उनके मानसिक जगत का सूरज और चांद एक-एक बार उगता और डूबता है, उतनी देर में दीवार पर टंगी घड़ी की सुईयां कभी चार तो कभी छः चक्कर लगा लेती है। बाबूजी अपनी घड़ी से चलते हैं और दुनिया वाली घड़ी से चलना हमारी आदत और मजबूरी दोनों है।
पेंडुलम वाली घड़ी के धीमी होने के पीछे विज्ञान एक बड़ा ही interesting explaination देता है - या तो पेंडुलम की लंबाई बढ़ गई हो या उस पर लगने वाला पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल कम हो गया हो। मजे की बात यह भी है कि वही बल उस पेंडुलम को लगातार oscillate भी करवाता रहता है। जन्म और मृत्यु की extreme नियति के बीच में डोलते इंसान की भी यही कैफियत है। 'अहंता' पेंडुलम की लंबाई निर्धारित करती है और 'ममता' उसे गतिशील रहने के लिए बल प्रदान करती है।
बाबूजी जैसे ऊंची शख्सियत वाले व्यक्तित्व की 'लंबाई' नहीं मापी जाती, उनका 'कद' मापा जाता है। वो ऊँचा कद, जो उन्होने अपने अथक प्रयासों से जीवन भर में establish किया। वह ऊँचा कद, जिसकी छाया से अभी तक हम निकल पाने में सक्षम नहीं हुए हैं और भविष्य में शायद कभी हो भी नहीं पाएंगे। 1980 तथा 1990 के दशक में बिहार में B.Ed करने वाले सभी छात्र-छात्राओं के लिए डॉ सच्चिदानंद सिंह का नाम अनसुना नहीं होगा। करीब 2 दशकों तक उनकी लिखी किताबें Teacher's Training के स्टूडेंट्स के लिए प्रेरणा स्रोत का काम करती आईं। जहाँ शैक्षणिक उपाधियों से उनकी किताबों में लेखक- परिचय का पूरा पृष्ठ भर जाता था, उस कद को उनका यह केवल स्नातक-उर्तीण ( B.Tech. only)बेटा केवल गर्व और सम्मान से ही तो देख सकता है।
पूरी तरह involve होकर अपने दम पर अपनी सारी जिम्मेदारी बखूबी निभा ली। सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए। बेटियों की शादी कर दी, बेटों को अपने पैरों पर खड़ा करवा दिया। हमारे ऊपर खुद का जीवन गुजारने के अलावा कोई बोझ नहीं छोड़ा। और फिर सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार उन्होंने बिल्कुल ठीक समय पर खुद को बहुत सारे जाल-जंजालों से मुक्त कर लिया। अपने अनुसार यथाशक्ति सबको अपना अपना जीवन जीने की स्वतंत्रता दे दी। 'ममता' की आसक्ति के बल को एक स्थितप्रज्ञ योगी की भांति deliberately धीरे-धीरे क्षीण करते चले गए। जैसे-जैसे स्मरण शक्ति घटती जा रही है, वैसे वैसे यह प्रक्रिया और accelerated होती जा रही है। लोगों को पहचानना भी धीरे-धीरे अनिश्चित होता जा रहा है। अपनी ही बनाई धरती से मोह कम होता जा रहा है।
भौतिकी की वही दिलचस्प शै याद आ रही है। इतने अच्छे से तो व्याख्या की थी- " कि घड़ी कैसे धीमी होती चली जाती है।" फार्मूला है, लगता ही रहेगा- अपने सारे limitations के बावजूद भी। हम denial की कितनी भी कोशिश कर लें, प्रकृति तो अपना काम करेगी ही। कल को हम सब की घड़ी mis-match होगी।

टिक टिक घड़ी -1

सदियों से कहते सुनते आए हैं कि मनुष्य नैसर्गिक रूप से एक सामाजिक प्राणी है। लेकिन गौर से अगर आप देखो तो इस विशेषण को पाने के लिए मनुष्य को अच्छी-खासी training और rythmic cycle से गुजरने की आवश्यकता होती है। सामाजिक व्यवस्था में resonate करने के लिए आपके body का time-schedule और समाज की conventional और established time-frame match करनी चाहिए। शुद्ध सरल भाषा में बोलो तो आपका biological clock दीवाल पर टंगी घड़ी की टिक-टिक से मैच करना चाहिए। मतलब जितने समय में पृथ्वी अपने अक्ष पर एक बार पूरी घूम जाती है,बस उतने ही समय में आप अपने जीवन की एक rythmic cycle complete कर लो। तब जाकर आप सामाजिक व्यवस्था से sychronise कर पाओगे।
नवजात शिशु अपने जीवन पहले दो-तीन महीनों में करीब 18-19 घंटे सोता है। उसे इस समाज की घड़ी से कोई मतलब नहीं होता। अपने हिसाब से सोते रहता है, भूख लगने पर रोकर indication दे देता है। धीरे-धीरे हम सब मिलकर उसे train करते हैं कि कब सोना है, कब जगना है, कब खेलना है, कब स्कूल जाना है, कब खाना है... फलाना फलाना।
मुद्दे की बात उसे तभी सोना चाहिए, जब बाकी सभी के सोने का वक्त है! कहानियां और मान्यताएं भी बना ली हमने। रात में ना सोने वाले को पढ़े-लिखे लोग निशाचर कहते हैं और हम जैसे मुंहफट लोग राक्षस या असुर की संज्ञा देते हैं। कभी सोचते ही नहीं कि हो सकता है उसका biological clock अलग हो। उसकी मजबूरी तक समझने की कोशिश नहीं करते कि हो सकता है उसने अपने body को इस तरह से condition किया हो। ( International Call centre मैं काम करने वाले को अधिकांश जन असामाजिक ही मानते हैं।)
दशकों की ऐसी तमाम training के बावजूद ढलती उम्र एक ऐसे पड़ाव पर ले आती है, जब शरीर पर आपका नियंत्रण नहीं रह जाता। शरीर अपने हिसाब से respond करने लगता है। आप कब जागेंगे और कब सोएंगे- दीवार की टिक-टिक घड़ी से वास्ता नहीं रह जाता। शरीर की activity- schedule और समाज के established time norms पूरी तरह से mis-match होने लगते हैं। बाकी सब जगे रहते हैं, तो आप सोते हैं। बाकी सब के सोने के टाइम में आप जगे रहते हैं।
भैया बता रहे थे कि बाबूजी का बायोलॉजिकल क्लॉक पिछले तीन चार महीनों से 48 घंटे का हो गया है- मतलब 24 घंटे सोना ,24 घंटे जगना। सो जाहिर सी बात है कि प्रचलित सामाजिक व्यवस्था में उनकी उपस्थिति नगण्य हो गई है। सो इसका शानदार सा तोड़ बाबूजी ने निकाल लिया है। उन्होंने अपना एक अलग ही समाज निर्मित कर लिया है- उनसे ही वह बतियाते हैं, वही उनके मित्र हैं,दोस्त हैं ,उन्हीं से लड़ते झगड़ते रहते हैं।

बदलती हवाएं

पिछले एक-दो सालों से देश की हवाएं कुछ बदल सी गई है। कभी लगता है कि भांग पड़ गई है, तो कभी लगता है कि जहर सी घुल गई है। हवाएं घनी होती जा रही है, धुंध सी बढ़ती जा रही है, कोहरे में दूर तक देख पाना बड़ा ही मुश्किल होता जा रहा है। इस पर कुछ लोगों का नया तुर्रा और उनके अजीबोगरीब फरमान- के भैया, खालिस ऑक्सीजन ही रखेंगे हवा में, बाकी सारी गैस गायब कर देंगे। यह बात अलग है कि फेफड़ों को इसकी खबर नहीं है!
बाबूजी इस उम्र में ना तो अखबार पढ़ते हैं, ना किसी से गप करते हैं, टीवी देखे हुए भी जमाना हो गया। सो हमें लगा कि बदलती वैचारिक क्रांति के सुर और देश के शुद्धिकरण के ताल से वो तो बिल्कुल अनभिज्ञ होंगे। वैसे भी बड़े आम आदमी का जीवन गुजारा उन्होंने। पहले भी कभी उन्हें राजनीतिक बहसों में नहीं पड़ते नहीं देखा और धर्म को लेकर तो पूरी तरह से "असली वाले निरपेक्ष" थे। पर इधर उनके भी चाल-ढाल, बात-व्यवहार और रिएक्ट करने का तरीका बदल सा गया है। लग रहा है कि समाज की सामूहिक अवचेतना अपना अधिकतम समय बेड पर गुजारने वाले अपने दसवें दशक को जी रहे एक कर्मयोगी की विचार-श्रंखला में आरोपित हो गई है। और किसको कहूं, यह तो पक्का बदली हवाओं का ही दोष है।
विश्वास मानो, हवा जरूर बदली है। जिन्होंने हमें धैर्य का संस्कार दिया, वही अब अधीर हो गए हैं। Semester-break की छुट्टियों में घर पर आए अपने पोते को सुबह-शाम convince करने पर लगे हैं कि वह कॉलेज जाने से पहले शादी कर ले। उसने पढ़ाई का हवाला दिया तो अपने जीवन के उदाहरण से चुप करा दिया। पूरी गाथा सुनाई की कैसे सातवीं क्लास में ही उनकी शादी हो गई थी और उसके बाद उन्होंने पढ़ाई continue रखते हुए MA(triple) और पीएचडी किया। और पुराणों की गाथाओं से लैस ऐसी शिद्दत से वह इस प्रयास में जुटे थे, मानो बाल विवाह संस्कृति का अभिन्न अंग और एक अनुकरणीय संस्कार है। भैया ने मलमास का हवाला देते हुए मामले को एक महीने तक खींचा; तब जाकर वह शांत और निश्चिंत हुए। सचमुच वंदनीय है सनातन व्यवस्था की परिपाटी, जो हर तरह के आचरण को अनुकरणीय और आदर्श बना देती है!
हर चीज की जल्दबाजी, हर बात में व्याकुलता। किसी भी चीज की demand मुंह से निकले नहीं कि वो सामने हाजिर होना चाहिए। मांग भी एक खत्म, कि दूसरी चालू। लगता है अपनी सरकार से उन्होंने रेस लगा ली है। जिस रफ्तार से सरकार हमें नए-नए मुद्दे पकड़ाए जा रही है, वैसी ही speed इधर भी चालू है। लगता है समय की कमी का एहसास दोनों को हो रहा है! execution में भी बड़ी समानता है। सब कुछ जल्दी खत्म करने की व्यग्रता दोनों के व्यवहार में अक्सर उग्रता का रूप लेते जा रहें हैं।
facebook, twitter, insta वगैरा बाबूजी को बिल्कुल पता नहीं, लेकिन उनकी स्मरण शक्ति और भूल जाने की शक्ति दोनों ही बड़ी ही तीव्र हो गई है - बिल्कुल social media generation की तरह। किसे पहचानेंगे और किसे नहीं पहचान पाएंगे - इस बात को लेकर बड़ी ही भ्रम और संशय की स्थिति रहती है। या जिसे सुबह में पहचाना, उसे शाम में भी पहचान लेंगे - इस बात की भी कोई निश्चितता नहीं है। पहचान लेने पर भी कैसा reaction show करना है, वो पूरी तरह से उनके मूड पर ही dependent है। यह बात भी दीगर है, कि कोई पहचाना व्यक्ति भी दो मिनट से अधिक उनके पास बैठ जाए, तो फिर उन्हें कोफ्त होने लगती है। फिर अपने logout होने का indication पूरे perfection से दे देते हैं; बिल्कुल blank screen हो जाते हैं। दूसरा बेचारा उठ खड़ा होता है। प्रणाम में आशीर्वाद एक ही मिलता है - " फेर अइहो।"
बदलती हवाएं सचमुच से बाबूजी के दिमाग में घुस गई है। आसपास दिख रहे लोगों का चेहरा भूलने लगे हैं, लेकिन अपने बचपन की लोग उन्हें याद आने लगे हैं। मिलने जाने वाले को ऊंची आवाज में बार-बार बताना पड़ता है कि वह कौन है। कभी पहचान लेते हैं और कभी नहीं पहचान पाते। पर पिछले कुछ महीनों से हर एक-दो दिन पर एक अजीब सा वाकया repeat होने लगा है।
बाबूजी के कमरे में उनके गेस्ट आते हैं। उन अतिथियों के भी बैठने की जगह नियत नहीं है। कुछ कुर्सी पर बैठते हैं, कुछ पंखे के पास, कुछ जमीन पर कोने में, तो कुछ हवा में ही रहते हैं। गर्मी में AC के पास, तो जाड़े में Blower के पास वो टिके रहते हैं। उनके नाम भी बाबूजी को नहीं पता, लेकिन वह उनके "अपने गेस्ट" हैं। उन अपनो के लिए चाय नाश्ते की फरमाइश करते रहते हैं। उनसे बात करते रहते हैं उन्हें अपने गांव वाले घर में settle करवाने का आश्वासन भी देते रहते हैं। बीच-बीच में ऐसे ही कुछ imaginative figures को डांटते भी रहते हैं- "जा भाग, यहां तेरे लिए कोई जगह नहीं है।" लगता है NRC Bill पूरी तरह से अक्षरशः बाबूजी के दिमाग में ही छप गया है !
हर बात में उतावलापन है, लेकिन एक चीज को लेकर निश्चिंतता है। पटना जाने पर इस बार भी बाबूजी ने वही बात दोहराई - "अयोध्या में राम मंदिर बनतौ, त ले चलिहे।" मैंने भी उनको पक्का आश्वासन दिया। लेकिन मेरे बाबूजी मेरे अनुमान से कहीं ज्यादा ही practical, pragmatic और realistic निकले। एक सवेरे उन्होंने सपाट स्वर में उद्घोषणा कर दी- " यमराज अइले छलै। ओकरा कह देलिऐ कि अब तीन साल बाद अइहो।"
यमराज भी सच्चे कर्म योगी की बात नहीं टालेंगे। सो मोदी जी, तीन साल का वक्त है, मंदिर तो बना ही डालो।

Friday, January 11, 2008

कुछ त्रिवेणियाँ

(१) चेहरा देखने की है अब फुर्सत कहाँ ,
पता याद रखने की भी जरूरत नही ।

सुना है अपने शहर का नाम भी बदल रहा है।


(२) अभी थम जाओ,साँसे लेना फिर ढ़ेर सारी,
हर नदी पर अब तो बाँध बन ही गए हैं ।

एक को छोड़ सब कह रहे थे, future secure कर लो ।


(३) तन्हा लगता है अकेले चलने पर
साथ होगी तो बोझ हो जाएगा ।

कहीं तुम याद तो नही ?


(४) अखबार उठाया, पापा ने डाँटा, कॉपी फाड़ी, मम्मी दौड़ी आई
कागज मिल नहीं पाए, ना पानी के जहाज बने, न उपर वाले ।

अब भी सफर मे कागज ही चूका करते हैं !


(५) सपने डाले,छौंक manners का,उसे भी डाल दिया,
आग नीचे जल रही थी, वो बेचारा पिघल रहा था ।

ऐसे ही तो घास-फूस का पेट्रोल बना होगा ।


(६) यूँ बच्चो सा क्यूँ करते हो? अब बड़े हो गये हो तुम!,
खेलने चलो , मैने असली गोली-बन्दूक निकाल ली ।

ज्यादा खेलने से बच्चे थक के सो जाया करते हैं!


(७) सूने रस्ते पथरीली आँखों मे उतर आए थे,
तिरंगा ओढ़े वो आया, पत्थर बह निकले ।

मेरे गाँव मे भी सूखे के बाद बाढ़ आई थी।